Shree Naval Kishori

नारदसंहिता अध्याय-14

इंद्रः प्रजापतिर्मित्रश्चार्यमाभूरि प्रिया ॥
कीनाशः कलिरुक्षाख्यौ तिथ्यर्धेशास्त्र्यहिर्मरुत् ॥१॥

इंद्र, प्रजापति, मित्र, अर्यमा, भूमि, लक्ष्मी, कीनाश, कलि, वृषभ, सर्प, वायु ये देवता कमसे बवादिकरणों के स्वामी कहे हैं ॥१।।

ववादिवणिगंतानि शुभानि करणानि षट् ॥
परीता विपरीता वा विष्टिर्नेष्टा तु मंगले ॥२॥

बवआदि वणिजपर्यत छह करण तो शुभ हैं और विष्टि अर्थात भद्राकी सब घडी सर्वदा अशुभ हैं मंगल कार्यमें वर्जदेनीचाहियें ॥२॥

मुखे पंचगले त्वेका वक्षस्येकादश स्मृताः ॥
नाभौ चतस्रः कट्यां तु तिस्रः पुच्छाख्यनाडिकाः ॥३॥

भद्राकी प्रथम पांच घडी मुखपर रखनी फिर १ घडी गलापर, फिर छातीपर, ग्यारह घडी, नाभिपर चार, कटिपर तीन, पूँछपर तीन घडी ॥३॥

कार्यहानिर्मुखे मृत्युर्गले वक्षसि निःस्वता ॥
कट्यामुद्रनं नाभौ च्युतिः पुच्छे ध्रुवो जयः ॥
स्थिरानि मध्यमान्येषां नेष्टौ नागचतुष्पदौ ॥४॥

मुखकी घाडियों में कार्यकी हानि, गलापर मृत्यु, छातीपर दरिद्रता, कटिपर भ्रमण, नाभिपर हानि, पूंछपरकी घटियों में कार्यकी सिद्धि होती है । इन्होंके बीचमें स्थिरसंज्ञक करण मध्यम है और नाग चतुष्पद ये दो अशुभहैं ॥४॥